Delivered an inspiring lecture on Independence Day by -Anushka Dimri

नमस्कार मैं अनुष्का डिमरी आप सभी को भारत के 79 वे स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।

इन 80 वर्षों में भारत ने एक बेहद लंबा सफर तय किया है इन बीते सालों में हमने सुई से सेटेलाइट और रुई से रॉकेट तक की यात्रा की ।

लेकिन आज मेरा विषय थोड़ा अलग है आज मैं आपको उपलब्धियों की उमंग नहीं बल्कि आंसुओं का वह अध्याय सुनाऊंगी जिसकी कीमत पर हमने 15 अगस्त 1947 कमाया है।

14 अगस्त 1947 माने आज़ादी से ठीक एक दिन पहले भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी लिखते हैं:

15 अगस्त का दिन कहता
आज़ादी अभी अधूरी है
सपने सच होने बाकी हैं
रावी की शपथ न पूरी है
दिन दूर नहीं खंडित भारत को
पुनः अखंड बनाएंगे
गिलगित से गारो पर्वत तक
आज़ादी पर्व मनाएंगे
उसे स्वर्ण दिवस के लिए आज से
कमर कसें बलिदान करें
जो पाया उसमें खो न जाए
जो खोया उसका ध्यान करें

तो आखिर ऐसा क्या खोया हमारे हिंदुस्तान ने कि उन्हें आज़ादी नके उल्लास में भी यह कविता लिखनी पड़ी भारत 15 अगस्त को आज़ाद हुआ था लेकिन उस आज़ादी में जो दर्द था वह एक दिन का नहीं था ,14 अगस्त को जो खोया क्या 15 अगस्त कभी उसकी भरपाई कर पाया?

राष्ट्रगान तो हम सभी को याद हैं पंजाब सिंध गुजरात मराठा क्या कभी राष्ट्रगान गाते हुए हम इस वेदना भूल सकते हैं कि पंजाब गुजरात और महाराष्ट्र तो आज भी हमारा है लेकिन सिंध हमसे बिछड़ गया।

तो चलिए मैं आपको लिए चलती हूं 14 अगस्त के उस ऐतिहासिक दिन जी हां मैं बात कर रही हूं विभाजन विभीषिका की -

10 लाख से ज्यादा लोग इस आपदा में मारे गए लाखों लोग हमेशा के लिए बेघर और अनाथ हो गए न जाने कितने ही लोगों को अपना घर परिवार छोड़कर सरहद के उस पार जाना पड़ा और अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिए गए। अनगिनत माताओं और बहनों की अस्मिता लूटी जा रही थी, बेबस सिंधु सतलुज की घाटी में पानी से ज्यादा खून बह रहा था।

न जाने कितने ही शरणार्थी बंटवारे की उस लाल लकीर को पार करने से पहले ही अपनी जिंदगी से हार गए। बंगाल, पंजाब और राजस्थान के मैदानों में अंतिम संस्कार को तरसती लाशें और काफी लोगों पर हो रहे दहशतगर्दो के हमले पूरी दुनिया देख रही थी लेकिन सब की संवेदनाएं शून्य हो चुकी थी।

यह फहरिस्त बहुत लंबी है यहां खत्म नहीं होती-

मैं कितनी भी कोशिश कर लूं
ये किस्सा रह जाएगा आधा
किस-किस के नाम गिनाऊं
सांसे कम है लोग ज्यादा

हिंदुस्तान ने अपने सबसे कीमती रत्नों को आज़ादी के नाम किया । यह भारत भूमि रक्त के रंग से सुर्ख नजर आने लगी। कलकत्ता, बंगाल, दिल्ली और मुल्क के बाकी हिस्सों से भी दंगों की खबरें आ रही थी, दर्जनों हत्याएं और न जाने कितने ही विस्फोट हो रहे थे। सिखों के खून में लिपटा हुआ लाहौर जल रहा था और आखिरकार इन हालातों में भारत को आज़ादी मिल रही थी।

14 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा की पांचवी बैठक में आज़ादी का ऐलान किया गया।

रात 11:55 पर संसद के सेंट्रल हॉल में नेहरू जी की आवाज गूंजती है वह कहते हैं:

"हमने नियति के साथ एक वादा किया था और अब समय आ गया है कि हम उस वादे को पूरा करें शायद पूरी तरह से नहीं पर कम से कम जहां तक हो सके वहां तक तो जरूर , आधी रात के वक्त जब पूरी दुनिया सो रही होगी तब भारत जीवन और आजादी की नई सुबह में अपनी आंखें खोलेगा"

संविधान सभा में तालियां थम नहीं रही थी सदस्य मेज थप थपा रहे थे स्वागत था एक नए भारत का, नए राष्ट्र का, आज़ाद भारत का जिसके सपने अब अपने होंगे।

लेकिन क्या आज़ाद भारत की आज़ादी की कहानी केवल इतनी थी? तो नहीं।

अब संविधान सभा के सामने नई गंभीर चुनौतियां थी। एक तरफ वो देश का नया कानून बनाने बैठे थे और दूसरी तरफ देशभर में हर तरह के कानून तोड़े जा रहे थे।

अब सभा में संविधान को बाकायदा लिखित रूप देने की दिशा में काम शुरू किया गया । संविधान को पूरी तरह बनने में करीबन 3 साल का वक्त लगा और पंडित नेहरू ने सामने रखी संविधान की उद्देशिका जो संविधान की आत्मा कहलाई और यही संविधान आज़ाद भारत की आत्मा बना जिसने भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया। हमारा संविधान ही वह शक्ति है जो हमें हिंदुस्तान की नागरिकता का अधिकारी बना देता है।

आप सोच रहे होंगे की आजादी के दिन संविधान की बात करना फजूल है और मैं आपका वक्त ज़ाया कर रही हूं लेकिन संविधान सभा ने ही आज़ाद भारत की नींव रखी थी और आज़ादी का ऐलान भी संविधान सभा की पांचवी बैठक में किया गया था।

आज भारत जिन परिस्थितियों में गिरा हुआ है ये मुझे उस दौर की याद दिलाता है जब भारत के पास अपना कानून, अपना संविधान, अपना आईन नहीं था। हाल फिलहाल में हमारे सामने ऐसी बहुत सी घटनाएं आई हैं जो की एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के पक्ष में नहीं है और हो रही है घटनाएं हमारे संविधान पर एक प्रश्न चिन्ह लगा देती हैं।

ऐसे में, मैं आप सभी को संविधान की उद्देशिका पढ़कर सुनाना चाहती हूं ताकि संविधान में हमारा जो विश्वास है वह अडिग रहे।

संविधान की प्रस्तावना

जुलाई 2024 तक संशोधित भारतीय संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार है:

हम, भारत के लोग, सत्यनिष्ठा से संकल्प लेते हुए,
भारत को एक संप्रभुता संपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाना
और अपने सभी नागरिकों को सुरक्षित करना:
न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक;
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता;
स्थिति और अवसर की समानता;
और उन सभी के बीच प्रचार करना
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता;
हम अपनी संविधान सभा में आज छब्बीस नवम्बर, 1949 को इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

अतः भारत की परिभाषा को समझाने के लिए वाजपेयी जी लिखते हैं -

भारत कोई भूखंड टुकड़ा नहीं है
जीता जागता राष्ट्र पुरुष है
यह चंदन की भूमि है , अभिनंदन की भूमि है
यह तर्पण की भूमि है , यह अर्पण की भूमि है
इसका कंकड़ कंकड़ शंकर है इसका बिंदु बिंदु गंगाजल है
हम जिएंगे तो इसके लिए, मारेंगे तो इसके लिए

और अंत में ,
' मैं रहूं या ना रहूं भारत यह रहना चाहिए '
इसी भावना के साथ
जय हिंद जय भारत
शुक्रिया